कहानी 1 किसान और फौजी 25.03.2014
एक बार किसान और फौजी थे। दोनो दोस्त थे। पर एक बार उनकी दोस्ती टूट गई। एक बार उन दोनो की माँ ने उन्हे कहा कि तुम दोनो जंगल घूमने जाओ। माँ की जिद से उन्हे जंगल जाना ही पड़ा। वह दोनो रास्ते में चलते रहे, इतने में शेर आ गया। फौजी की बंदूक ने शेर के प्राण हर लिए। वो लगभग 40000 किमी. चल चुके थे।रास्ते में कई दुविधाएॅ आई, पर उन दोनो ने उनका हल निकाल लिया। जानवरों से सुरक्षा फौजी ने की और खाने लायक फलों को किसान ने ढूंढा। अब वे घर पहुचने ही वाले थे कि अचानक एक शेर ने फौजी पर हमला कर दिया। किसान ने फटाफट फौजी की बंदूक निकाली और शेर को गोली मारी। फायदे की बात तो यह है कि फौजी को छोटी सी खरौच ही आयी थी, परन्तु दुःख की बात तो यह थी कि फौजी बहोशी की हालत में था। पर किसान एक ऐसे फल के बारे में जानता था कि जिससे बहोशी की हालत दूर की जा सकती थी। किसान ने फल आखिर मे ढूंढ़ ही निकाला। और उसको पीसकर फौजी को पिलायी। दो घंटे के बाद फौजी ठीक हो गया। और फौजी और किसान ने फिर से हाथ मिला लिया। और वो घर की ओर चल दिये। घर पहुचते ही उन्होनें अपनी माँ से जंगल की सारी घटना बताई।
माँ ने उनसे कहा कि ”बेटा दोस्ती कभी टूटती नहीं हैं, बल्कि भगवान आपकी परीक्षा लेने के लिए ऐसा करता हैं।“
सीखः- दोस्ती बहुत नाजुक होती हैं। दुनियाँ में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले दोस्त 100 मे से 2 ही मिलते हैं। हमे ऐसे दोस्त नहीं गवाने चाहिए।
कहानी 2 देशभक्त 26.03.2014
एक बार एक आदमी था, उसका नाम प्रकाश था। वैसे तो वह फौजी नहीं था, इसलिए देश के कई फौजियों ने उसका नाम देशभक्त रख दिया। एक बार वह बोर्डर पर देश की सेवा कर रहा था। वह शुभ दिन था क्योंकि उस दिन गाँधी जयंती थी। देश के सभी फौजियों को भारत के प्रधानमंत्री श्री असरू सिंह बोर्डर के पास पुरस्कार दे रहे थे। सबसे पहले राष्ट्रगान हुआ और सब ऊपर गर्दन करके खड़े हो गये। फिर श्री असरू सिंह ने पहला पुरस्कार देशभक्त को दे दिया, क्योंकि वो अपनी घर गृहस्ती को हमेशा के लिए छोड़कर देश की सेवा में लग गए थे। दूसरा पुरस्कार नवाब को और तीसरा अशोक को दिया गया। प्रधानमंत्री जी चाहते थे कि देशभक्त देश के बारे में कुछ कहे। देशभक्त मंच पर आए और उन्होने कहा ”मेरे फौजी भाइयों मे आपसे एक बात कहना चाहता था पर मैनें सोचा कि मुझे कोई अवसर मिले तो मैं कुछ कहु। ये कौनसा पुरस्कार हैं, मैं तो अपनी भारत माता की शरण मे आया हुँ। मैंने अपना घर नहीं छोड़ा है, भारत ही मेरा घर हैं।
ये पूरा भारत देश हमारा है, बस यही हमारा नारा है।
मेरा देश महान है, दुश्मन पाकिस्तान हैं।
राजस्थान का भाई गोकुलभाई भट्ट, कसना चाहिए देश का नट।
अगर हमारी सरकार है अच्छी, तो कहलाएगी कि पूरी जनता है सच्ची।
दोस्तो 2 अक्टुबर खुशी का दिन है तो 30 जनवरी दुःख का दिन है।
ऐसे सारे फौजियों ने अपने-अपने विचार रखे।
कविता 1 रात में बजता बाजा 26.03.2014
रात में बजता बाजा, कोयल बोले आजा-आजा।
बाजा आया कोयल के पास, फिर खेलने लगे वो तास।
आसमान से गिर गया पानी, कोयल को याद आयी नानी।
बाजा बोला भाग-भाग, कोयल बोली तेरे नीचे साँप-साँप।
बाजा रोकर बोलता, साँप तु मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ता।
साँप बोला मैं तुझे पकड़कर रहूँगा, आज मैं तुझे नहीं छोडुंगा।
सापिन बोली कि साँप मैं आ रही हुँ, कोयल बोली मैं तुझे खा रही हुँ।
कहानी 3 देशभक्त अर्जुन को फांसी 28.03.2014
(एक दिन ऐसा भी था जब अर्जुन को फांसी हुई थी। मैं आपको चार दिन पहले की बात बताता हुँ जब अर्जुन को फांसी हुई थी। अर्जुन जेल मे था क्योंकि अंग्रेजी हुकुमत के विरूद्ध आंदोलन किया था।)
हवलदार रितेश सिंह का जेल में प्रवेश
रितेश- बेटा अर्जुन! मुझे माफ करना कि मैं तुम्हारी तरह भारतीय हुँ, पर अंग्रेजों ने हमे गुलाम बना रखा है, इसीलिए मैं तुम्हे बचा नहीं सकता। बेटा तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या हैं?
अर्जुन- मैं अपनी धरती माता के लिए एक हवन रखना चाहता हँु और मैं अपने माता-पिता, भाई-बहिन से मिलना चाहता हँु। आप बताओ कि फांसी में ज्यादा तड़फना तो नहीं पड़ता है ना?
रितेश- (हंसकर) नहीं-नहीं बेटा! एक सैकेण्ड में प्राण चले जाते है और पता भी नहीं चलता। मैं हवन की तैयारी करता हँु।
(हवन पूरा होता है और सरकार उसे 1 दिन के लिए माता-पिता से मिलने के लिए छौड़ देती हैं।)
अर्जुन का घर में प्रवेश
अर्जुन- (गेट खटखटाकर) हेलो! कोई है?
माता- बेटा! तुम ठीक तो हो ना? फाँसी तो नहीं हुयी ना तुम्हे? क्या सरकार ने तुम्हे छोड़ दिया?
अर्जुन- (थोड़ा रूककर) माँ! टाप मेरी चिन्ता नहीं करना। सरकार ने मुझे फाँसी की सजा सुनाई हैं। माँ! आप मेरे पिता और भाई-बहिन को फाँसी के बारे में मत बताना। उनसे कहना कि मुझे पूरे 50 वर्ष के लिए जेल की सजा हुयी हैं।
(धीरे-धीरे वो दिन भी आ गया और अर्जुन को फाँसी हो गयी। माँ जब भी किसी दूसरे देशभक्त को देखती थी तो उन्हे अर्जुन की याद आती और वह रो पड़ती थी।
ज्ञान 1 पानी बचाएँ 28.03.14
कई लोग जल को व्यर्थ बहाते है जैसे- मटके और टोकणी के पानी को फेंक देते हैं। जब मैनें उनसे पूछा कि आप मटके के जल को फेंक देते हैं, तो फिर कुई के जल को सुरक्षित क्यों रखते हो? उन्होनें जबाव दिया कि “कुई का जल तो अमृत होता है तो भला उस जल को कैसे फेकें?”
दोस्तों यदि जल अमृत हैं तो उसे फेकनें से क्या फायदा? अगर जल नहीं होता तो वसुन्धरा पर एक भी जीव नहीं होता। हम कपडे़ धोते है, बर्तन मांजते है और कई काम करते हैं। इसमें शेष जल को हम पेड़-पोधो में ड़ाल सकते हैं।
दोस्तों मेरा मतलब यही है कि आप ज्यादा से ज्यादा पानी को बचाओ और पानी का दुरूपयोग नहीं करे।
कविता 2 कोयल आयी पास 29.03.2014
कोयल आयी पास, खेले दोनो तास।
कोयल बोली कि मौसम सुहाना, कौआ तु है काला।
रात दिन सिर्फ काला रहता, आसमान से बाते करता।
कोयल बोली हो गया तु काला, क्या तु है देश का रखवाला।
सुन्दर परियाँ तुझको भाती, वो क्या तुझे देखने आती?
काला मुँह तेरा और गोरी नाक, लगता है तु बनाता है कड़ाई मे साग।
आसमान से बाते करना यही तुम्हारा काम है, काला कौआ यही तुम्हारा नाम हैं।
तेरे घोसलें में ड़ालती हुँ अपना अंड़ा, क्या तु पीता है बीड़ी का बंड़ा?
तेरे घोसलें से मुझे बहुत प्यार है, घोसले का नाम अनाम है।
तेरे घोसले से चमकता है बगीचा, क्या दिखाना चाहता है तु मुझे नीचा?
कविता 3 बुरा न मानो होली है 30.03.2014
बुरा न मानो होली है, रंगो की रंगोली हैं।
खूब दिनों से आयी है, संग ढेरो खुशियाँ लाये हैं।
खाओ समौसे और मिठाई, कई दिनों से होली आई।
कई दिनों से होली आई है, रंगो की बौछार लाई है।
फाल्गुन का महिना है, रंगों से भी रंगीला है।
आज जलायेंगे हम होली, कल मारेंगे पिचकारी की गोली।
समुह सम्राट मे है एक बगीचा, रंगो से हो गया रंगीला।
आसमान हो गया रंगीला, रंगो से हुआ मे नीला।
रंगो से भरी होली थी, रंगो की बनायी रंगोली थी।
कहानी 3 भगवान हरि और शिकारी 30.03.2014
एक बार की बात है, एक राज्य मे एक राजा था, जिसका नाम अनुरूध था। उसके चार बेटे थे। उन सभी का नाम था-श्याम, हरि, अक्ष और समद था। श्याम और हरि की अलग जोड़ी थी तथा अक्ष और समद प्रायः साथ-साथ रहते थे। एक बार श्याम और हरि जंगल मे जा रहे थे कि वहाँ पर एक कबुतर अचानक से गिर पड़ा। फिर शिकारी उसे ढूंढते-2 उन दोनो के पास पहुंचा और कहा कि “ओ बालकों! यह कबुतर मेरा है, मुझे दे दो, नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।” हरि बोला-“ऐ दुष्ट शिकारी! इस दुनियां मे तुझसे बुरा है भी कौन? यह कबुतर मेरा है क्योंकि मारने वाले से बचाने वाले का हक इस पर ज्यादा होना चाहिए। तो बता कि मेरा क्या कर लेगा?” शिकारी ने एक तीर फेंका और वह चलाया तो था हरि के लिए, परन्तु वह तीर श्याम को लग गया। हरि अपना क्रोध नहीं रोक पाया और उसने अपनी तलवार निकालकर झट से शिकारी की गर्दन काट दी। हरि ने श्याम को लगा हुआ तीर निकाला और उस तीर को अंतरीक्ष मे फेंक दिया। वह तीर इतनी तेजी से गया कि उससे बादल फट गये पर चिन्ता की बात नहीं थी क्योंकि जो बादल फटे थे उससे नीचे राक्षसों का नगर था और वो सभी राक्षस डूबकर मर गये। हरि का क्रोध इतना बढ़ गया था कि उसने जंगल के सारे पेड़ उखाड़ दिये। इतने में यमराज भगवान प्रकट हुये, उन्होनें कहा “क्या हुआ भगवन?” हरि ने कहा कि “मुझे श्याम की आत्मा चाहिए चाहे कुछ भी हो जायें।” यमराज ने आत्मा दे दी। और दोनो घर चले गये। दोस्तो हरि भगवान के अवतार थे।
ये कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है।
कहानी 4 धनपाल की अच्चाई 01.03.2014
एक राज्य में एक अंगत नाम का राजा था। वह अत्याचारी था तथा पुरे गांव के लोग उससे डरते थे। उस गांव मे धनपाल नाम का एक व्यक्ति रहता था जो बहुत गरीब था। वो राजा अंगत को राजगद्दी से उतारकर किसी ओर को बनाना चाहता था। सभी गाँव वाले उसे राजा समझते थे। पुरे गाँव वासियों ने आंदोलन किया, पर फिर भी कुछ नहीं हुआ। फिर युद्ध हुआ और युद्ध मे राजा अंगत विजयी हुआ। इसमें सात व्यक्ति घायल हुए और एक के प्राण निकल गये। फिर बाद मे धनपाल ने योजना बनाकर गांववालों को बतायी। उस योजना से सारे गांव वाले सहमत हो गये। योजना के अनुसार धनपाल राजा के पास गया और रोने लगा। राजा ने कहा “अब हो गया खुश? राजा से युद्ध करेगा? चल मैं तुझे माफ करता हुँ। धनपाल ने राजा से विनती करी और कहा“ सरकार मुझे आप से एक निवेदन है कि आप मेरे घर पधारें।” राजा ने सोचा कि चलो चलते है।
वह रास्ते मे चले। धनपाल ने लोगों को इशारा किया और गाँववालों ने जाल फेंका और राजा और उसके सैनिक जाल में फंस गए। गाँववालों ने जाले मे आग लगा दी और जाले के साथ राजा और सैनिक भी जल गए। फिर धनपाल ने किसी अच्छे व्यक्ति को राजगद्दी पर बैठा दिया। अब सारी प्रजा सुखी हैं।
सीखः हमेशा अच्छाई की जीत होती है और बुराई की हार होती है। जैसें- धनपाल की जीत और राजा की हार।